गौ हत्या बंद हो सकेगी क्या - 4
भविष्य में गाय का जीवन बचने के कई उपाय हो सकते हैं। ऋषि दयानद ने गाय की रक्षा का उत्तम, सरल, सीधा और आसान तरीका यह सुझाया था कि प्रत्येक गांव और नगर में गौशालाएं स्थापित की जाएं। उनके कारगर उपाय को कुछ लोगों ने अपनाया जरूर परन्तु उसे विस्तार नहीं मिला। अब समय आ गया है उनके विस्तार पर फूल चढ़ाए जायेंगे। पंजाब हरियाणा और दिल्ली आदि प्रदेशों में गाय के रक्षक किसानों ने गाय की निर्भरता को चाहे नकार दिया है परन्तु गाय के साथ मानवीय और ममत्व का रिश्ता जो किसान का था वह किसी और का नहीं था। किसान के लिये गाय पूजनीय थी लेकिन आज एक ही कारण ने गाय और किसान के बीच दूरियां उत्पन्न कर दीं। गाय के प्रति श्रद्धाभावना रखने वाले किसान अब अपनी खेती-बाड़ी के कार्यों में गाय को छोड़ ट्रैक्टर और उसके अन्य औजारों पर आश्रित हो गए। जोत छोटी हो गई, परिवार छोटे हो गए, कृषिभूमि के अभाव में चरागाहें सिकुड़ गईं। किसानों ने गाय के दूध-घी के स्थान पर भैंस को अपना लिया, किसान की गाड़ी खींचने वाले बैलों के स्थान पर कटड़ा बग्गी आ गई। इस प्रकार किसान ने समय के साथ गाय की प्रत्येक प्रकर की उपयोगिता से पल्ला झाड़ लिया। हां गाय के प्रति किसान की ममता, मोह और श्रद्धा ज्यों की त्यों बरकरार है। क्योंकि अब गाय आवारागर्दी करती हुई किसानों के खेतों को बेशक उजाड़ती फिर रही है परन्तु किसान उसे पकड़कर किसी गोशाला में चाहे छोड़ आये परन्तु अपनी देखती आँखों कसाई को नहीं ले जाने देगा और पूरी श्रद्धा के साथ गोशालाओं को दान देगा, मुफ्त चारा भी देगा। यहां तक कि आज भी किसानों के विवाह-शादियों तथा ख़ुशी के अन्य अवसरों पर अपनी श्रद्धा समान गोशालाओं को जरूर दान दिया जायेगा। यदि गांवों में अधिकाधिक गोशालाएं खुलवाई जाने का प्रचलन चल पड़े तो गांव में खुलने वाली कोई भी गोशाला चारे या आर्थिक अभाव के कारण बंद नहीं होगी।
अब तो पुरे देश धर्माचार्यों एवं सामाजिक नेताओं का यह कर्त्तव्य बनता है कि प्रत्येक बड़े गांव तथा नगर में अपने प्रचार के पुरुषार्थ द्वार गाय का जीवन बचाने तथा उसकी नस्लवृद्धि के लिए अधिकाधिक गोशालाएं खुलवाएं। जितना बड़ा संकट गाय के ऊपर आज आ गया है इतना देश के इतिहास में कभी नहीं आया था और गाय पर यह संकट उस समय आया है जब इसकी अत्यधिक आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जनसंख्या की बढ़ोतरी के कारण घर-घर में अनेक प्रकार की बिमारियों ने अपना घर बना लिया है। इसीलिए आज गाय के चमड़े की आवश्यकता है, हड्डी व्यापारियों को गाय की हड्डियों की आवश्यकता है क्योंकि जिस प्रकार गाय के मांस का निर्यात होता है इसी प्रकार गाय के चमड़े का दूध और घी बहुतायत में मिलने लग जाए तो विदेशों में इन दोनों की भी अत्यधिक मांग है तथा व्यापारिक दृष्टि से इनके निर्यात की भी अपार संभावनाएं हैं। यदि आज का मानव गाय की उपेक्षा छोड़कर इसे पुनः अपनाले तो गाय जैसी अनमोल वस्तु तथा मूल्यवान धन संसार में कोई नहीं है। गोपालन बेरोजगार युवकों के लिए भी रोजगार का बड़ा साधन है। यदि बेरोजगार युवक मछलीपालन की भांति गायपालन के लिये डेयरियां बनाएं तो विश्व बैंक बिना ब्याज के उदारतापूर्वक कर्ज प्रदान करता है। आज चिकित्साजगत को गाय के घी की इतनी आवश्यकता जितनी किसी और को नहीं। क्योंकि गाय के घी के अभाव में अन्य पशुओं के घी से काम चलाया जा रहा है जो कारगर सिद्ध नहीं हो रहा, जिस कारण ओषधियों की गुणवत्ता में कमी आ रही है।
Motivational speech on Vedas by Dr. Sanjay Dev
Ved Katha Pravachan -14 | Explanation of Vedas | बालक निर्माण के वैदिक सूत्र एवं दिव्य संस्कार-3
जिस प्रकार गायों की डेयरी फार्मिंग के लिये विश्व बैंक आर्थिक सहायता करता है उसी प्रकार सरकार को तथा पशुपालन विभाग को गौशालाओं की अनुदान रूप में आर्थिक सहायता करनी चाहिए. वोटों के भूखंड राजनीतिज्ञ और उनसे बनी सरकार जो देश में गोहत्या बंद नहीं करवा सकती, गोहत्यारों के वोटों से डरकर गोवध-बंदी कानून नहीं बना सकती वह सरकार अपनी सरकारी सहायता से देश में बड़े पैमाने पर गायों के लिये डेयरी फार्म खुलवा सकती है, गोशालाओं को भारी अनुदान देकर गोशालाओं के प्रचलन की राष्ट्रीय जनस्वास्थ्य के प्रश्न से जोड़कर केंद्र सरकार कानून बना सकती है। केंद्र सरकार गोधन को आर्थिक विषय की सूचि में रखकर भी कानून बना सकती है जिससे निर्यातकों को गाय के दूध-घी का निर्यात करने की सुविधा मिल सकती है। जबकि सरकार तथा राजनीतिज्ञों को इस से दो लाभ होंगे, एक तो संसद में गोवध-बंदी कानून बनाने की आवश्यकता नहीं रहेगी, जिस कारण सरकार गोहत्यारों की नाराजगी से भी बच जायेगी। दूसरे सरकार की खजाने को गोधन से अतिरिक्त सहारा मिल सकेगा। आजादी के बाद से आज तक देश का उच्चवर्ग, कारखानेदार, धन्ना सेठ और हिन्दू धर्म के ठेकेदार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, हिन्दू महासभा तथा उनकी लगमात की पचासों अन्य संस्थाएं चिल्ला-चिल्लाकर बांग देते रहें है कि देश की संसद गोवध-बंदी कानून बनाकर गाय का जीवन बचाये।
आज उनके सामने यह ज्वलंत प्रश्न है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णय दिया जा चूका है कि देश में गोहत्या अवैध है तथा गोहत्या पर तुरन्त रोक लगाई जाए जबकि देश की सरकार इस निर्णय के बाद भी मौन है, उसे लागू करवाने की ओर जरा भी ध्यान नहीं दे रही है बल्कि असमर्थ दिखाई दे रही है। यदि तो हिन्दू समाज की चिल्लाहट गाय का जीवन बचाने के लिये सही थी तो उन्हें चाहिए कि वे सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लागू करवाएं और यदि वे सरकार पर दबाव बनाने में असफल रहें तो सरकार को चेतावनी दे दें कि आगे से सरकार यानी कांग्रेस उनके वोटों की ओर मुंह करके भी न देखे। दूसरे जो धन्ना सेठ कालाबाजारी करते है धन छिपाने का स्थान नहीं मिलता, उन्हें चाहिए कि वे अपने काले धन सहित अपनी तिजोरियों का मुंह गोशालाओं की ओर खोल दें तथा प्रत्येक नगर में गोशाला खुलवाएं और उन्हें उदारता से दान दें। आज गऊ के ऊपर भारी संकट है। क्या उन्हें हाट बाजारों में भूखी फिरती गायें नजर नहीं आतीं? गाय के नाम झूठा नारा देने वाले धन्ना सेठों को, हिन्दू समाज के ढोंगी ठेकेदारों को क्या दिवालिया पिट गया? क्या उनकी आत्माएं सो गई या मर चुकी हैं? क्या उन्हें अपने पुराने नारे याद नहीं आ रहे जब वे दिल्ली के संसद मार्ग पर खड़े होकर लगाया करते थे। ''देश धर्म का नाता है, गाय हमारी माता है" जागो हिन्दू ठेकेदारों जागो। - ओमप्रकाश पत्रकार
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Now the cow is loathing the fields of the farmers strolling, but the farmer may capture it and leave it in a cowshed, but will not let his eyes see the butcher and will donate to the cowshed with full devotion, and will also give free fodder. Even today, on the occasion of the wedding-weddings of the farmers and other occasions of happiness, their reverence will definitely be donated to the same gaushalas.
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महान योगी और चिन्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने महात्मा विरजानन्द से ढाई वर्ष तक अष्टाध्यायी, महाभाष्य और वेदान्त सूत्र आदि की शिक्षा ग्रहण की। जब शिक्षा पूर्ण करने के बाद विदा की बेला आई तो दयानन्द ने कुछ लौंग गुरुदक्षिणा के रूप में गुरु के सम्मुख रखकर चरण स्पर्श करते हुए देशाटन की आज्ञा मांगी।...
सकारात्मक सोच का विकास बहुत अधिक धन-दौलत, शोहरत और बड़ी-बड़ी उपलब्धियां ही जीवन की सार्थकता-सफलता नहीं मानी जा सकती और ना ही उनसे आनन्द मिलता है। अपितु दैनिक जीवन की छोटी-छोटी चीजों और घटनाओं में आनन्द को पाया जा सकता है। लोग अक्सर अपने सुखद वर्तमान को दांव पर लगाकर भविष्य में सुख और आनन्द की कामना और प्रतीक्षा करते रहते हैं।...